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Tuesday, November 1, 2022

लिखूंगा

तुम एक स्याह हो एक कलम 

तुमसे अगणित बार लिखूंगा 

तुम एक विषय हो एक विशेषण 

तुमपे अगणित बार लिखूंगा


तुमको ही संसार लिखूंगा 

तुमको ही अधिकार लिखूंगा 

जीवन के इस पार लिखूंगा 

जीवन के उस पार लिखूंगा


तेरी खुशियों का अंबार लिखूंगा 

तेरे दर्दों का आधार लिखूंगा

सांसों का संचार लिखूंगा 

धड़कन की रफ्तार लिखूंगा


तुझको ही माणिक हार लिखूंगा 

तुझको ही सोलह श्रृंगार लिखूंगा 

दर्पण के इस पार लिखूंगा 

दर्पण के उस पार लिखूंगा


                   -  संदीप सिंह 

Sunday, October 23, 2022

टूटने का नई

 वो मुझे छोड़ के गई

 मुंह मोड़ के गई

 पूरा तोड़ के गई

बोली अपना मैच नहीं है, 

और तो और दिल भी अटैच नहीं है

लेकिन नई नई नई 

नई मैं टूटा नई हूं रे

नई मैं रूठा नई हूं रे

मैं सच बोलता बेबी मैं सच बोलता

मैं झूठा नई हूं रे

तू जा जा, तू अपना मैच कर

ढूढ, किसी को दिल अटैच कर

अरे टेंशन लेने का नई

मैं पटरी पे कूदेगा नई

में पंखे से झूलेगा नई

मैं नदिया में डूबेगा नई

मैं सुट्टे पे सुत्ता सुट्टे पे सुत्ता 

सुट्टे पे सुत्ता खीचेगा नई

मैं अपने ही आसुओं में 

रो रो के भीगेगा नई

जा मेरी जां, जा जा जा

जा ऐश कर

आई प्रॉमिस, मैं तुझको दिखेगा नई

दिखेगा तो मिलेगा नई, 

मिलेगा तो बात काई को करेगा

बात किया भी तो करेंट अफेयर्स की करेगा, 

क्रिकेट प्लेयर्स की करेगा, 

मैं चीखेगा नई चिल्लाएगा नहीं

बात मान मैं झुंझलाएगा नहीं

गुस्साएगा नहीं

मैं होश खोएगा नहीं मेरी जान मैं रोएगा नहीं

                              -    संदीप सिंह 



Thursday, October 6, 2022

मगर आज मेरा दिल तन्हा है...

 न जाने कितनी रातें 

न जाने कितनी बातें

जाने कितनी सौगातें

मगर आज मेरा दिल तन्हा है...


न जाने कितनी डगर

न जाने कितने सफ़र

जाने कितने हमसफ़र

मगर आज मेरा दिल तन्हा है...


न जाने कितने सिलसिले

न जाने कितनी महफिलें

जाने कितने दिल मिले

मगर आज मेरा दिल तन्हा है...


                -   संदीप सिंह 

रात

 ये रात काली ये आसमां नीला

ये हसीन तारे चंद्रमा रंगीला

ये राह सूनी ये बरगद सजीला

ये सड़क पे सोता कोई कबीला

ये भूखा बच्चा खाली पतीला

ये रात काली ये आसमां नीला

ये मुड़ती सड़क ये परछाइयां

ये घना अंधेरा उसपे तन्हाइयां

ये रोता बेटा मां की रुबाइयां

ये रोती मां बाप की दवाइयां

यही तो है रात की सच्चाइयां

ये मुड़ती सड़क ये परछाइयां


                   - संदीप सिंह 

तुम समझोगी!

 मैं तुमसे कहूं भी तो क्या, तुम समझोगी

आवारा है मनचला कहीं का

मैं कह भी दूं कि मधुबाला लगती हो,

मुस्कुराती हो जब, तुम समझोगी

बेशरम है बेहया कहीं का

मैं कह भी दूं कि थामे रक्खूंगा हाथ

बड़ी से बड़ी मुश्किलों में, तुम समझोगी

नौटंकी है बावला कहीं का

मैं तो कह दूं कि इश्क़ है तुमसे, जैसे

अदरक को चाय से, रास्ते को सफ़र से

मगर तुम समझोगी, कोई

मदमस्त, मस्तमौला, छैला कहीं का


                          - संदीप सिंह 

Tuesday, September 20, 2022

वो

 


वो लाज लपेटे लाल हुई

वो फिर से आज कमाल हुई

वो छत पे गीले बाल हुई

वो फिर से आज बवाल हुई....


वो पल्लू लपेटे कूल्हे पे

वो फिर से आज कमान हुई

वो सुर्ख गुलाबी होठ लिए

वो पनवारी का पान हुई....


वो केशों के मेघ लिए उमड़ी

वो फिर मयखाने की शाम हुई

वो नैन नशीले मतवाले से

वो फिर पैमाने का जाम हुई....

                        

              - संदीप सिंह

पापा

 


मेरे जीवन की नीव जिसने गढ़ी है

मेरी सांसों की धार जिससे बढ़ी है


जिसकी उंगली पकड़ के दौड़ा हूं मैं

जिसकी आंखों से दुनिया मैंने पढ़ी है


सर पे हाथ रख के विजय कर दिया

असंभव लड़ाई जिसके दम से लड़ी है


जिसने नीद ओ चैन लुटा दी मेरे लिए

मेरी खातिर ख़ुद की मुश्किलें गढ़ी हैं


मेरे सपने ज़िंदा रह सके इस ख्वाहिश में

जिसके ख्वाबों की हर दिन बलि चढ़ी है


ज़िन्दगी से जूझता रहा खामोशी समेटे

मुझे देख चेहरे की जिसकी हसी बढ़ी है


जिसे देख के लगता है सारी दुनिया मेरी है

जिसकी सूरत भगवान ने भगवान सी गढ़ी है

                                        - संदीप सिंह 

Saturday, September 17, 2022

मेरे साथ चलो कुछ दूर!

 

यूं हाथ छूटा सहसा तो न जाने क्या होगा

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


इस अंतहीन सफ़र में छांव भी नहीं दिखती

ऊपर से ये धूप बड़ी मगरुर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


सबसे सुना है पथ पथरीला रस्ता खाबड़

जहरीले सांपों से भरपूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


ऊपर से सब रंगे हुए है नेकी के रंगों से

अंतस में सारे ही हैं क्रूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


ये भी तय है सुमन खिलेगें पथ में बहारों का दस्तक होगा

पर तुम बिन कैसा नूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


एक चले जाने को साहस हृदय नहीं करता

पर मैं नियति से मजबूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर

                             - संदीप सिंह 

Saturday, August 13, 2022

असहाय

 


वो चीखी होगी बहोत चिल्लाई तो होगी

वो बच्ची उस दिन बहोत रोई तो होगी


दरिंदों ने जब जकड़ा होगा चंगुल में उसे

हाथ पैर पटके बहोत छटपटाई तो होगी


माना कि बहुत क्रूर थी उस दिन की हवाएं मगर

लौ बुझने के पहले बहोत फड़फड़ाई तो होगी


सोची होगी कोई तो आ जाए बन के ख़ुदा

अपने भगवान से गुहार लगाई तो होगी


गीता में लिखा है कि वो सब जानता है

देख उसको उसे फिर दया आई तो होगी


मुझे अचरज नहीं कि सब मौन बैठे हैं जमीं पर

तुझे ख़ुदा कहते हैं तुझमें कुछ करिश्माई तो होगी


जिनके पापों को भूल जाती रही है ये दुनिया

उनके हिसाबो की किताब तूने बनाई तो होगी


इंसाफ़ करने में अब ज्यादा वक़्त मत लगाना भगवन

मुझे डर है देर हुई तो तेरी जग हसाई तो होगी 


                                - संदीप सिंह 



Tuesday, July 5, 2022

सुकून - तलाश

 

आंख मूद, सोच तू

क्या तेरी तलाश है

इधर उधर हैं झंझटें

सुकून तेरे पास है

तेरी जो निगाह है

व्यर्थ ही निराश है

उसको ढूंढ थक गया

जो तेरे ही पास है

तू थका है सोचता

आराम तो मिले कहीं

उतार दे थकान जो

वो शाम तो मिले कहीं


नाप के तू मंजिले

पार कर के साहिलें

जो तू लौटा ठौर पे 

खुद को देखा गौर से

बौखलाया तू बहुत 

क्या भला था छूट गया

सोच में था तू भला

क्या मुझे नहीं मिला

आसमां की चाह में

सुकून फेका गाह में 


रास्तों ने रख दिया

जब उसे झिझोड़कर

सुकून की तलाश में

उल्टे पांव दौड़ कर

छान मारी महफिलें

ढूढ़ डाले काफ़िले

तू समझ न पाया कि

ये कौन सा जुनून है 

जो भी चाहा पा लिया

न क्यूं मगर सुकून है 

            - संदीप सिंह 

Sunday, June 26, 2022

नंदी के कैलाश वापसी

 

गौरा कहिन गणेश से

जाई खड़े दुआरे हो

केउ न भितरे आवई पावई

चाहे जे केउ होय 


माता के आज्ञा पाई के

भयें दुआरे ठाढ़ 

अब कोहू न अंदर जाई देब

आंधी होई कि बाढ़ 


कुछ देर भई कि नंदी पहुंचे

भूतन के टोली संग

दिखिन गदेला रस्ता रोके

हंस हंस के पड़ि गएं दंग


कहिन गणेश का प्यार से

हम भोले के दूत

हमका अंदर जाई दा

करा न कौनऊ करतूत


फेर नंदी से गणपति कहिन 

हमार एकई बात विशेष

पार्वती हमार माता अउर 

हम ओनकर दास गणेश


केउ न अंदर जाई पाई

रहतई गौरी पूत

तू ता बस दूतई आहा

हम रोकि देब यमदूत


सुनि के उल्टी बात

नंदी का आवा क्रोध

देखा बेटवा अइसन है

तू हा अबा अबोध


प्यार से समझाइत ही

रस्ता छोड़ा हमार

अ द्वारपाल आहा ता

जाई के खोला द्वार


लड्डू पकड़ावत नंदी का

पूछिन लड्डू लेब

हिअइन बैइठि के लड्डू खई

अंदर ता न जाई देब


अब नंदी का खिसियानी छूट

गुस्सा मां हल्ला बोलि दिहिन

अ हर हर महादेव चिल्लाई के

गणपति पर धावा बोलि दिहिन


लेकिन बाल न बांका कई पाइन

सब जने भएं हताश

उल्टे पांव दौड़ि पड़े 

भागत पहुंचे कैलाश

सब हांफत पहुंचे कैलाश

कि सब कांपत पहुंचे कैलाश

हर हर महादेव

                - संदीप सिंह 


          


Wednesday, June 22, 2022

अगर तुम लौट आते!

 

फूल खिलखिला उठते बगिया में

भौंरे फिर मनचले हो जाते

जरा सा खोल लेता दिल मैं भी

अगर तुम लौट आते


सरगम फिर गुनगुना उठती

गीत फिर से बहक जाते

जरा सा मैं भी हो जाता आवारा

अगर तुम लौट आते


चांद भी आता चांदनी लपेटे

तारे भी टिमटिमा जाते

जरा सा थोबड़ा मैं भी सजाता

अगर तुम लौट आते

              -    संदीप सिंह 

Tuesday, May 17, 2022

मुसाफ़िर


मैं मस्ती में रहने वाला

मैं मस्त मगन हूं मतवाला

जगत की जाने राधे माधव

मैं अपनी धुन में रहने वाला


मैं पंक्षी उन्मुक्त गगन का

नहीं घरौंदे का ख्याला

नहीं शाम कोई बाट जोहता

मगर पुकारे मधुशाला


नहीं कोई है नियम कायदा

इस जीवन को जीने वाला

मैं अल्हड़ हूं मस्त मलंगा

जीवन का रस पीने वाला


ठौर नहीं न कोई ठिकाना

मैं एक जगह न टिकने वाला

जिसने मुझको पढ़ा ठहर के

जगत के भूला वो जंजाला


दुनिया के झामे मैं न जानू

इसका उसका गोरा काला

दिन भर पाव सफ़र पे रहते

शाम सजे अधरो पे प्याला


हिसाब किताब न मेरे बस का

मैं इन चक्कर न पड़ने वाला

जब मदिरालय में बैठक है तो

कौन गिने कि कितने प्याला?


मेरा गम से रिश्ता सच्चा

मैं दर्दों का रस पीने वाला

खुशी का आंचल मैं क्या जानूं

दर्द ने मुझको पोसा पाला

                       -संदीप सिंह