मेरे जीवन की नीव जिसने गढ़ी है
मेरी सांसों की धार जिससे बढ़ी है
जिसकी उंगली पकड़ के दौड़ा हूं मैं
जिसकी आंखों से दुनिया मैंने पढ़ी है
सर पे हाथ रख के विजय कर दिया
असंभव लड़ाई जिसके दम से लड़ी है
जिसने नीद ओ चैन लुटा दी मेरे लिए
मेरी खातिर ख़ुद की मुश्किलें गढ़ी हैं
मेरे सपने ज़िंदा रह सके इस ख्वाहिश में
जिसके ख्वाबों की हर दिन बलि चढ़ी है
ज़िन्दगी से जूझता रहा खामोशी समेटे
मुझे देख चेहरे की जिसकी हसी बढ़ी है
जिसे देख के लगता है सारी दुनिया मेरी है
जिसकी सूरत भगवान ने भगवान सी गढ़ी है
- संदीप सिंह
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