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Wednesday, September 26, 2018




                                          फिर से बच्चा बना दे, ऐ ज़िंदगी !

ऐ ज़िंदगी चल झाँके जरा बचपन में 
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से अच्छा बना दे 
नहीं सम्भलेगी मुझसे ये जद्दोज़हद तेरी 
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से बच्चा बना दे  

ये भाग दौड़ ये नाकामियाँ 
ये रोज-रोज के तमाशे 
रातों की नींदे लूट बैठी 
ये बेकार झूठी ख्वाहिशें 
तोड़कर इन ख्वाहिशों के तिलिस्म को 
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से सच्चा बना दे 
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से बच्चा बना दे


ये फालतू दुनियादारियाँ 
ये तमाम परेशानियाँ 
थक गए मेरे कंधे उठाते 
ये बेमतलब ज़िम्मेदारियाँ 

जा लाद किसी और पे अपनी ये झंझटें 
मुझे मेरा बस्ता दे और बच्चा बना दे 
ऐ ज़िंदगी मेरा बचपन मुझे लौटा दे 

किसी का दिल दुखाऊँ मैं 
कोई मेरा तोड़ दे 
साथ न निभा पाऊँ तो 
कोई मुझे छोड़ दे 
जरुरत नहीं किसी सफर हमसफ़र की 
ऊँगली पकड़ा के पापा की फिर से चला दे 
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से बच्चा बना दे



ये सुबह का जाना 
और शाम को आना 
मुझे कुछ जमता नहीं 
लोगों से मिलना मिलाना 
बड़ी-बड़ी बातों के ढ़र्रे से डरता हूँ मैं 
दे के खिलौना मुझे फिर बच्चा बना दे 
ऐ ज़िंदगी मेरा बचपन मुझे लौटा दे


ये रिश्ते ये नाते 
ये वादे ये बातें 
दूर कर इनको मुझसे 
रत्ती भर नहीं सुहाते 
मत बाँध इन स्वार्थी बंधनों में 
बस मेरी माँ का छोटा बच्चा बना दे 
ऐ ज़िंदगी मेरा बचपन मुझे लौटा दे

जहाँ हर मन लज्जित हो 
विचार जहाँ संकुचित हो 
निर्णय लेती हो जरूरतें 
परिचित कौन अपरिचित हो 
ऐसी समझदारी न बख्स ऐ ज़िंदगी 
नासमझ सही पर तू मुझको अच्छा बना दे 
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से बच्चा बना दे

ये शाने-शौक़त 

ये तेरी दौलत 
ये महल अटाले 
ये तेरी ज़न्नत 
तुझको मुबारक ये तेरे ऐशो-आराम 
मुझे माँ का आँचल दे बच्चा बना दे 
ऐ ज़िंदगी मेरा बचपन मुझे लौटा दे

ये नज़्म ये रुबाइयाँ 
ये गीत और शहनाइयाँ 
दिल नहीं बहलाती मेरा
तेरी कोई कहानियाँ 

माँ की लोरी सुना के आराम से सुला दे 
ऐ ज़िंदगी मेरा बचपन मुझे लौटा दे
ऐ ज़िंदगी तू मुझे फिर से बच्चा बना दे





                                                         -SANDEEP SINGH-



Tuesday, September 11, 2018





                                             मैं और तुम : एक रिश्ता 




भवरा बन मडराऊँ मैं, तुम कँवल हो जाओ                 
चलो आज लिख दूँ तुमको, तुम गज़ल हो जाओ
हाथ पकड़ कर तुम मेरा, जो बैठो कभी बगीचे में
मैं टुक-टुक तुमको देखूँ, तुम ताज़महल हो जाओ





बन पतंग मैं उड़ता फिरूँ, तुम डोरी हो जाओ
जब नींद न आए रातों में, तुम लोरी हो जाओ
यूँ बस जाओ तुम आके मेरी रूह के अंदर
दिल चाहे ग़र धड़कना, तुम जरुरी हो जाओ


बन बाती मैं जल जाऊँ, तुम दिया हो जाओ
उठे हाथ दुआ में मेरे, तुम अर्जियाँ हो जाओ
हो असर मेरे गीतों में कुछ यूँ तुम्हारा
जब लिखुँ गीत कोई, तुम सुर्खियाँ हो जाओ



आवारा हो जब भटकूँ, तुम मंज़िल हो जाओ 
जब तन्हाई समेटे मुझको, तुम महफ़िल हो जाओ
चलो ख़त्म करे ये समझने समझाने का किस्सा
मैं दिल बन जाऊँ तुम्हारा, तुम मेरा दिल हो जाओ










सुनो,
चलो आज लिख दूँ तुमको, तुम गज़ल हो जाओ
मैं टुक-टुक तुमको देखूँ, तुम ताज़महल हो जाओ........

                                 





                                                                                                                              -संदीप सिंह