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Tuesday, May 26, 2020

कौन लिखेगा???



श्री कृष्ण, कौरव पांडव, सब यहां लिखते रहे हैं
जो सृष्टि का है खुद रचयिता, सब उसे रचते रहे हैं
कोई नहीं है जो यहां, मानव हृदय का सार लिख दे
धीर लिख दे, धैर्य लिख दे, प्रेम की बौछार लिख दे
कौन है जो स्नेह लिख दे, मां का दुलार और बचपन
तात के उपकार लिख दे, मित्र का अद्भुत समर्पण
उपवन में फूलों का खिलना, पर्वत से झरने का गिरना
कौन लिखेगा बगिया में, कलियों से भवरे का मिलना
ग्रीष्म काल में तपती धरा पर, बारिश की बूंदों का गिरना
बिजली का कड़कना अम्बर में, कौन लिखेगा मेघों का घिरना

शब्दों का उलटफेर कर, कवि गर्व से सजते रहे हैं
जो सृष्टि का है खुद रचयिता, सब उसे रचते रहे हैं

देश पे न्योछावर सदा, अगणित जवानी कौन लिख दे
इस धरा पर कुर्बानियों की, पावन कहानी कौन लिख दे
किसी वीर का बखान कर दे, स्त्रीत्व का श्रृंगार लिख दे
शोषित की व्यथा लिखे जो, शोषक को धिक्कार लिख दे
जो राजनीति का गंदा तमाशा, धर्म का व्यापार लिख दे
कौन है जो रक्त रंजित, पाप पोषित संसार लिख दे
दिनदहाड़े लुटी अस्मिताएं, कौन भला चीत्कार लिखेगा
वासनाओं के चंगुल में जकड़ी, कौन देह व्यापार लिखेगा 
नेताओं की गुंडागर्दी, मनमानी, कहो कौन इन्हें शैतान लिखेगा 
पुलिस अदालतें इनके पीछे, फिर कौन भला परिणाम लिखेगा

लोकप्रियता की ललक में, हम सब ढोल से बचते रहे हैं
जो सृष्टि का है खुद रचयिता सब उसे रचते रहें हैं

- संदीप सिंह

Sunday, April 19, 2020

साँवरे


साँवरे




मेरो तन संग रँग गयो, मेरो मन साँवरे
मोहि रँग के दे गयो, इक उलझन साँवरे
तोहि सोच, मेरो रोम रोम है मगन साँवरे
अति बरसत है आज, प्रसन्न हो गगन साँवरे 
तन गया तर और, भीग गई धड़कन साँवरे
मेरो तन संग रँग गयो मेरो मन साँवरे.....

मोहि छेड़त जात है, हर घट पनघट साँवरे
सखियाँ रिझावत हैं, लटक लटक कर मटक साँवरे 
रँग डारो मोहि अंग अंग, लपट झपट साँवरे
कोमल कलइयाँ हैं, खींच के न झटक साँवरे
चूनर चिपकी तन से, कुर्ती में सिलवट साँवरे
मोहि छेड़त जात है हर घट पनघट साँवरे.....

मैं शरमाई, सकुचाई, लाज से लाल साँवरे
तोरे हाथन से रँग के आज, हूँ निहाल साँवरे
चैन नहीं मनवा को, मत पूछ, मेरा हाल साँवरे
गाल लाल और केश जाल, सब तोरे नाल साँवरे
बहकत जात हूँ मैं, मोहे अब सँभाल साँवरे
मैं शरमाई सकुचाई लाज से लाल साँवरे.....


                                                                                                                                      - संदीप सिंह

Friday, April 17, 2020


अच्छा किया तुमने!

राज़ की बातें खोलकर अच्छा किया तुमने
दिल में जो था बोलकर अच्छा किया तुमने
शहद सी तुम्हारी बातों को इश्क़ समझ कर पीते थे
आज कड़वाहट घोलकर अच्छा किया तुमने

दरवाजा खुला छोड़कर अच्छा किया तुमने
जो सो गई चादर ओढ़कर अच्छा किया तुमने
मैं समझता था मुझे चाहती हो तुम मेरी तरह
आज वहम वो तोड़कर अच्छा किया तुमने

भरी महफ़िल में बदनाम कर अच्छा किया तुमने
यूं तमाशा सरे आम कर अच्छा किया तुमने
अपना मान बैठे थे तुम्हें हम उम्र भर के लिए
आज हाथ गैर का थामकर अच्छा किया तुमने

मेरे दर्दों से मुह मोड़कर अच्छा किया तुमने
मेरा गम से रिश्ता जोड़कर अच्छा किया तुमने
भ्रम था आंसुओं को देख पिघल जाओगी तुम
पर आज रोता छोड़कर अच्छा किया तुमने
आज कड़वाहट घोलकर अच्छा किया तुमने
आज वहम वो तोड़कर अच्छा किया तुमने
आज हाथ गैर का थामकर अच्छा किया तुमने


                                - संदीप सिंह



Tuesday, March 31, 2020






चेतावनी

ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर

वो पेड़ काटता न, उजाड़ता जंगल
प्रकृति से लड़ता, न दिखाता अपना बल
शौक पालता महलों के, न अट्टालियाँ बनाता
बिना रसायन के ही अपनी फसलें उगाता
न दे पाया सुकूँ मगर उसको मिट्टी का घर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर

ये महज़ किसी विषाणु की नहीं इकाई है
स्थिति ये यूँ है कि तूने इंसानियत लुटाई है
मंदिर, मस्ज़िद, गिरज़ाघर में ऐसे पड़े हैं ताले
मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमां, कहाँ गए बोलने वाले
उसके संयम खोने से ही बरसा है कहर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर

सब जानते हैं निकलेगा इसका भी हल
फिर बनेंगी इमारतें और साफ होंगे जंगल
आज दुबके हैं घर में, कल छाती ठोकेंगे
अपने लालच को भला ये मनुज कैसे रोकेंगे
महा विनाश के चक्र का आएगा अंतिम प्रहर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर

महामारी नहीं इसको, तुम चेतावनी समझो
प्राण बच जाए तो, किस्मत का धनी समझो
ईश्वर का इशारा है, खुद में बदलाव लाओ
प्रकृति से प्रेम करो, प्राणियों में समभाव लाओ
जो अब नहीं समझे तो प्रलय है मुकर्रर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर

ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर


                                                                                                                       - संदीप सिंह



Sunday, March 29, 2020





   बेजुबाँ का दर्द 
      ( भाग - १ )




तीन चार बच्चे हट्टे कट्टे
घर के सामने एक कुतिया के
उछल कूद करते रहते
माँ के ऊपर चढ़ते उतरते
वो बड़े प्यार से निहारती
और कभी जीभ से चाटती
सब आपस में लड़ते रहते
बस खिलवाड़ करते रहते
कुतिया स्नेह से ताकती रहती
फिर कभी तेज से भौंकने लगती
कोई निकलता यदि सड़क से
सोचती कहीं कोई नुकसान 
पहुँचा न दे बच्चों को

ऐसे ही था वक़्त कुछ दोपहर का
बड़ी गाड़ी में था आदमी शहर का
सो रहे थे चारों बेजुबाँ 
कुतिया न जाने थी कहाँ 
वो गाड़ी तेज रफ़्तार से
कुचल गई चारों को कतार से
मैं स्तब्ध देखता रहा खड़ा
वो गाड़ी वाला आगे बढ़ा
अति करूणीय मंजर था
टूटा कुटिया पर कहर था

एक पिल्ले का सिर चकनाचूर था
पूरी सड़क पर खून ही खून था
अगले दो पैरों से 
दूसरा घिसट रहा था
माँस उसके बदन का
सड़क से चिपक रहा था
पीछे का बदन उसका
टूट गया था पूरा
पिस गई थी हड्डियाँ
जैसे लकड़ी का चूरा
हल्की सी कूँ कूँ की आवाज में
वो कराह रहा था
शायद वो बेजुबाँ अपनी
माँ को बुला रहा था
                                                               . .. . . .निरंतर . . . .  . .


   - संदीप सिंह