अच्छा किया तुमने!
राज़ की बातें खोलकर अच्छा किया तुमने
दिल में जो था बोलकर अच्छा किया तुमने
शहद सी तुम्हारी बातों को इश्क़ समझ कर पीते थे
आज कड़वाहट घोलकर अच्छा किया तुमने
दरवाजा खुला छोड़कर अच्छा किया तुमने
जो सो गई चादर ओढ़कर अच्छा किया तुमने
मैं समझता था मुझे चाहती हो तुम मेरी तरह
आज वहम वो तोड़कर अच्छा किया तुमने
भरी महफ़िल में बदनाम कर अच्छा किया तुमने
यूं तमाशा सरे आम कर अच्छा किया तुमने
अपना मान बैठे थे तुम्हें हम उम्र भर के लिए
आज हाथ गैर का थामकर अच्छा किया तुमने
मेरे दर्दों से मुह मोड़कर अच्छा किया तुमने
मेरा गम से रिश्ता जोड़कर अच्छा किया तुमने
भ्रम था आंसुओं को देख पिघल जाओगी तुम
पर आज रोता छोड़कर अच्छा किया तुमने
आज कड़वाहट घोलकर अच्छा किया तुमने
आज वहम वो तोड़कर अच्छा किया तुमने
आज हाथ गैर का थामकर अच्छा किया तुमने
- संदीप सिंह
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