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Tuesday, March 31, 2020






चेतावनी

ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर

वो पेड़ काटता न, उजाड़ता जंगल
प्रकृति से लड़ता, न दिखाता अपना बल
शौक पालता महलों के, न अट्टालियाँ बनाता
बिना रसायन के ही अपनी फसलें उगाता
न दे पाया सुकूँ मगर उसको मिट्टी का घर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर

ये महज़ किसी विषाणु की नहीं इकाई है
स्थिति ये यूँ है कि तूने इंसानियत लुटाई है
मंदिर, मस्ज़िद, गिरज़ाघर में ऐसे पड़े हैं ताले
मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमां, कहाँ गए बोलने वाले
उसके संयम खोने से ही बरसा है कहर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर

सब जानते हैं निकलेगा इसका भी हल
फिर बनेंगी इमारतें और साफ होंगे जंगल
आज दुबके हैं घर में, कल छाती ठोकेंगे
अपने लालच को भला ये मनुज कैसे रोकेंगे
महा विनाश के चक्र का आएगा अंतिम प्रहर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर

महामारी नहीं इसको, तुम चेतावनी समझो
प्राण बच जाए तो, किस्मत का धनी समझो
ईश्वर का इशारा है, खुद में बदलाव लाओ
प्रकृति से प्रेम करो, प्राणियों में समभाव लाओ
जो अब नहीं समझे तो प्रलय है मुकर्रर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर

ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर


                                                                                                                       - संदीप सिंह



Sunday, March 29, 2020





   बेजुबाँ का दर्द 
      ( भाग - १ )




तीन चार बच्चे हट्टे कट्टे
घर के सामने एक कुतिया के
उछल कूद करते रहते
माँ के ऊपर चढ़ते उतरते
वो बड़े प्यार से निहारती
और कभी जीभ से चाटती
सब आपस में लड़ते रहते
बस खिलवाड़ करते रहते
कुतिया स्नेह से ताकती रहती
फिर कभी तेज से भौंकने लगती
कोई निकलता यदि सड़क से
सोचती कहीं कोई नुकसान 
पहुँचा न दे बच्चों को

ऐसे ही था वक़्त कुछ दोपहर का
बड़ी गाड़ी में था आदमी शहर का
सो रहे थे चारों बेजुबाँ 
कुतिया न जाने थी कहाँ 
वो गाड़ी तेज रफ़्तार से
कुचल गई चारों को कतार से
मैं स्तब्ध देखता रहा खड़ा
वो गाड़ी वाला आगे बढ़ा
अति करूणीय मंजर था
टूटा कुटिया पर कहर था

एक पिल्ले का सिर चकनाचूर था
पूरी सड़क पर खून ही खून था
अगले दो पैरों से 
दूसरा घिसट रहा था
माँस उसके बदन का
सड़क से चिपक रहा था
पीछे का बदन उसका
टूट गया था पूरा
पिस गई थी हड्डियाँ
जैसे लकड़ी का चूरा
हल्की सी कूँ कूँ की आवाज में
वो कराह रहा था
शायद वो बेजुबाँ अपनी
माँ को बुला रहा था
                                                               . .. . . .निरंतर . . . .  . .


   - संदीप सिंह