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Sunday, March 29, 2020





   बेजुबाँ का दर्द 
      ( भाग - १ )




तीन चार बच्चे हट्टे कट्टे
घर के सामने एक कुतिया के
उछल कूद करते रहते
माँ के ऊपर चढ़ते उतरते
वो बड़े प्यार से निहारती
और कभी जीभ से चाटती
सब आपस में लड़ते रहते
बस खिलवाड़ करते रहते
कुतिया स्नेह से ताकती रहती
फिर कभी तेज से भौंकने लगती
कोई निकलता यदि सड़क से
सोचती कहीं कोई नुकसान 
पहुँचा न दे बच्चों को

ऐसे ही था वक़्त कुछ दोपहर का
बड़ी गाड़ी में था आदमी शहर का
सो रहे थे चारों बेजुबाँ 
कुतिया न जाने थी कहाँ 
वो गाड़ी तेज रफ़्तार से
कुचल गई चारों को कतार से
मैं स्तब्ध देखता रहा खड़ा
वो गाड़ी वाला आगे बढ़ा
अति करूणीय मंजर था
टूटा कुटिया पर कहर था

एक पिल्ले का सिर चकनाचूर था
पूरी सड़क पर खून ही खून था
अगले दो पैरों से 
दूसरा घिसट रहा था
माँस उसके बदन का
सड़क से चिपक रहा था
पीछे का बदन उसका
टूट गया था पूरा
पिस गई थी हड्डियाँ
जैसे लकड़ी का चूरा
हल्की सी कूँ कूँ की आवाज में
वो कराह रहा था
शायद वो बेजुबाँ अपनी
माँ को बुला रहा था
                                                               . .. . . .निरंतर . . . .  . .


   - संदीप सिंह 


9 comments:

  1. सुपर ऑब्जर्वेशन

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  2. आपकी कविताओं में वाकई प्यार और दर्द दोनों समिल है।ऐसा लग रहा है जैसे की सब कुछ सामने ही हो रहा है।

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    1. आप भी एक उत्तम पाठक हैं जो कविता के भावों को अपने हृदय में स्थान देते हैं। आपका अभिनन्दन 🙏

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  3. आपकी कविताओं में वाकई प्यार और दर्द दोनों समिल है।ऐसा लग रहा है जैसे की सब कुछ सामने ही हो रहा है।

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  4. Bhut hi karunamai poem hai bhai

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