बेजुबाँ का दर्द
( भाग - १ )
तीन चार बच्चे हट्टे कट्टे
घर के सामने एक कुतिया के
उछल कूद करते रहते
माँ के ऊपर चढ़ते उतरते
वो बड़े प्यार से निहारती
और कभी जीभ से चाटती
सब आपस में लड़ते रहते
बस खिलवाड़ करते रहते
कुतिया स्नेह से ताकती रहती
फिर कभी तेज से भौंकने लगती
कोई निकलता यदि सड़क से
सोचती कहीं कोई नुकसान
पहुँचा न दे बच्चों को
ऐसे ही था वक़्त कुछ दोपहर का
बड़ी गाड़ी में था आदमी शहर का
सो रहे थे चारों बेजुबाँ
कुतिया न जाने थी कहाँ
वो गाड़ी तेज रफ़्तार से
कुचल गई चारों को कतार से
मैं स्तब्ध देखता रहा खड़ा
वो गाड़ी वाला आगे बढ़ा
अति करूणीय मंजर था
टूटा कुटिया पर कहर था
एक पिल्ले का सिर चकनाचूर था
पूरी सड़क पर खून ही खून था
अगले दो पैरों से
दूसरा घिसट रहा था
माँस उसके बदन का
सड़क से चिपक रहा था
पीछे का बदन उसका
टूट गया था पूरा
पिस गई थी हड्डियाँ
जैसे लकड़ी का चूरा
हल्की सी कूँ कूँ की आवाज में
वो कराह रहा था
शायद वो बेजुबाँ अपनी
माँ को बुला रहा था
. .. . . .निरंतर . . . . . .
- संदीप सिंह
Bhawnao ka ati sundar chitran
ReplyDeleteधन्यवाद्
Deleteसुपर ऑब्जर्वेशन
ReplyDeleteथैंक्यू सर
Deleteआपकी कविताओं में वाकई प्यार और दर्द दोनों समिल है।ऐसा लग रहा है जैसे की सब कुछ सामने ही हो रहा है।
ReplyDeleteआप भी एक उत्तम पाठक हैं जो कविता के भावों को अपने हृदय में स्थान देते हैं। आपका अभिनन्दन 🙏
Deleteआपकी कविताओं में वाकई प्यार और दर्द दोनों समिल है।ऐसा लग रहा है जैसे की सब कुछ सामने ही हो रहा है।
ReplyDeleteBhut hi karunamai poem hai bhai
ReplyDeleteआभार भ्राता।
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