मैं मस्ती में रहने वाला
मैं मस्त मगन हूं मतवाला
जगत की जाने राधे माधव
मैं अपनी धुन में रहने वाला
मैं पंक्षी उन्मुक्त गगन का
नहीं घरौंदे का ख्याला
नहीं शाम कोई बाट जोहता
मगर पुकारे मधुशाला
नहीं कोई है नियम कायदा
इस जीवन को जीने वाला
मैं अल्हड़ हूं मस्त मलंगा
जीवन का रस पीने वाला
ठौर नहीं न कोई ठिकाना
मैं एक जगह न टिकने वाला
जिसने मुझको पढ़ा ठहर के
जगत के भूला वो जंजाला
दुनिया के झामे मैं न जानू
इसका उसका गोरा काला
दिन भर पाव सफ़र पे रहते
शाम सजे अधरो पे प्याला
हिसाब किताब न मेरे बस का
मैं इन चक्कर न पड़ने वाला
जब मदिरालय में बैठक है तो
कौन गिने कि कितने प्याला?
मेरा गम से रिश्ता सच्चा
मैं दर्दों का रस पीने वाला
खुशी का आंचल मैं क्या जानूं
दर्द ने मुझको पोसा पाला
-संदीप सिंह