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Tuesday, May 17, 2022

मुसाफ़िर


मैं मस्ती में रहने वाला

मैं मस्त मगन हूं मतवाला

जगत की जाने राधे माधव

मैं अपनी धुन में रहने वाला


मैं पंक्षी उन्मुक्त गगन का

नहीं घरौंदे का ख्याला

नहीं शाम कोई बाट जोहता

मगर पुकारे मधुशाला


नहीं कोई है नियम कायदा

इस जीवन को जीने वाला

मैं अल्हड़ हूं मस्त मलंगा

जीवन का रस पीने वाला


ठौर नहीं न कोई ठिकाना

मैं एक जगह न टिकने वाला

जिसने मुझको पढ़ा ठहर के

जगत के भूला वो जंजाला


दुनिया के झामे मैं न जानू

इसका उसका गोरा काला

दिन भर पाव सफ़र पे रहते

शाम सजे अधरो पे प्याला


हिसाब किताब न मेरे बस का

मैं इन चक्कर न पड़ने वाला

जब मदिरालय में बैठक है तो

कौन गिने कि कितने प्याला?


मेरा गम से रिश्ता सच्चा

मैं दर्दों का रस पीने वाला

खुशी का आंचल मैं क्या जानूं

दर्द ने मुझको पोसा पाला

                       -संदीप सिंह