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Sunday, October 6, 2019





                                                                                                            नीम का पेड़
              
              


ऊंची डाली पे डाल के झूला जब मैं झूला करता
गिर जाओगे, लग जाएगी, कहता रहता नीम का पेड़

कड़ी धूप में सारे बच्चे, जब घर में सोते रहते थे
मैं मस्त छांव में खेला करता, तपता रहता नीम का पेड़

कभी तोड़ देता टहनियां, कभी खाल भी देता छील
कभी नहीं कुछ बोला वो, सहता रहता नीम का पेड़

गुस्से में जब मां मुझको, झाड़ू ले के दौड़ाती थी
मैं चक्कर काट के बचता था, हसता रहता नीम का पेड़

कभी स्कूल से घर आता तो मां होती थी खेतों में
टहनी पे चढ़ के सो जाता मैं, थपता रहता नीम का पेड़

गांव छोड़ने से पहले, पेड़ काटने की बात चली थी
मैं गुमसुम बैठा रहता, मुझको तकता नीम का पेड़

इतने बरस बीत गए, उमर बीत गई और बचपन भी
स्मृति से कभी जाता नहीं, दुलार दिखाता नीम का पेड़

                                                         - संदीप सिंह

Saturday, September 21, 2019




 बंद सिग्नल से



सिग्नल खुलने के इंतज़ार में
किसी चौराहे पे था मैं खड़ा
टकटकी लगाए गिन रहा था 
उन्न्यासी,अठहत्तर,सतहत्तर 
तभी देखा फटे हुए कपड़ों में
बगल में था एक बच्चा खड़ा
आंखों में कीचड़ 
मुंह में लार बहाये
बदन पे पूरे 
धूल का अंबार सजाये 
मांस से पसलियां झांक रही थी
काले नाखून बाल खुजा रहे थे
मैं देख ही रहा था 
कि बोल पड़ा
साहब पेन पांच का छोटा 
दस का बड़ा
ले लो न साहब
मेरे मुंह से निकल गया- क्या करूंगा
बोला साहब लिख लोगे कुछ
ले लो न साहब
वो पेन बेच रहा था 
लिखने की उम्र में
उसकी ये सज़ा थी
जाने किस जुर्म में
पता नहीं क्यूं 
क्रंदन सा मच गया
अंदर सीने में 
जैसे कुछ फस गया
और सिग्नल खुलने से पहले
मैंने दो पेन ले लिए
और उसी के दिए हुए पेन से
उसी के लिए ये अल्फ़ाज़ दे दिए
फिर याद आया कि उसने कहा था
कि साहब कुछ तो लिखोगे.........


                                         -संदीप सिंह 

Thursday, September 5, 2019



गुरू




गुरु संदीपनी की असीम कृपा से
प्रभु कृष्ण बने थे नंद के लाला
ये गुरु द्रोण की शिक्षा दीक्षा थी
जो अर्जुन को धनुर्धर कर डाला

गुरु विश्वामित्र को कोटि नमन
जग को पुरुषोत्तम श्री राम दिया
गुरु चाणक्य का विश्वास था ये
नन्हें से बालक को सम्राट किया

कैसे भूलेगा जग श्री परशुराम को
तिरस्कृत कर्ण को महारथी बनाया
प्रणाम है गुरुवार श्री रामकृष्ण को
विवेक को जिसने ईश्वर से मिलाया

गुरु बिना सब माटी है,
गुरु बिना सब कच्चे हैं।
चाहे जितनी उम्र बढ़े
बिना गुरु सब बच्चे हैं।

      - संदीप सिंह

Sunday, August 11, 2019




ऐ ज़िन्दगी


ऐ ज़िंदगी ,
ले ले तू कितने भी इम्तिहाँ 
कर दे ख़िलाफ सारा जहाँ 
मैं चलूँगा, चलता रहूँगा 

पथ को मेरे तू कर दे विलय
या खड़े कर अनगिनत हिमालय 
मैं बढूँगा, बढ़ता रहूँगा 

ग़र तेरी ख़्वाहिश है मुझे गिराने की 
मेरी भी ज़िद है फिर मुस्कुराने की 
मैं हसूँगा और हसता रहूँगा

तू बुझा दे रौशनी के सारे मशान
मिटा दे सूरज चाँद और आसमान
मैं जलूँगा, जलता रहूँगा

तुझे है चुनौती बार बार हर बार
रास्तों पे रख दे मुश्किलें हजार 
मैं लड़ूँगा, लड़ता रहूँगा 

ऐ ज़िंदगी ,
कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरी तूफान हवाओं में
ज़िक्र है जिनका रोज़ माँ की दुआओं में 
मैंने कहा था और कहता रहूँगा
मैं चलूँगा, चलता रहूँगा
मैं जलूँगा, जलता रहूँगा
मैं हसूँगा और हसता रहूँगा


                                                     -संदीप सिंह 



                                                        

Wednesday, June 26, 2019





           
                                                                               
                      इक ख़्वाब सा

              हाथ पकड़ कर चल मेरा 
              कोई नई कहानी हो जाये 
            छत के ऊपर चाय पिएं 
              हर शाम सुहानी हो जाये 
              गुज़रा बचपन गलियों में 
              तेरे नाम जवानी हो जाये 
               हो जाये तू मुझको हासिल 
              हर चीज़ बेगानी हो जाये 
               सुबह-शाम मैं देखूं तुझको 
              कोई चीज़ नूरानी हो जाये 
              बन जाऊं मैं तेरा दीवाना 
              तू मेरी दीवानी हो जाये 
              हाथ पकड़ कर चल मेरा 
              कोई नई कहानी हो जाये


                                                       -संदीप सिंह 
              

Thursday, April 11, 2019




                                                                                                               चौकीदार


   
 तोड़ दो या फोड़ दो      
या मुझे झकझोर दो
मैं नहीं हटूंगा
सदा डटा रहूंगा
मैं "अटल" वो द्वार हूं
हां, मैं चौकीदार हूं

अन्याय के विरुद्ध ये
शुरू हुआ है युद्ध ये
जम के मैं लडूंगा
वचन मैं ये दूंगा
मैं इसका भागीदार हूं
हां, मैं चौकीदार हूं

लूट अब न पाओगे
मुफ्त का न खाओगे
झूठ के प्रपंच से
वोट नहीं पाओगे
मैं सत्य की पुकार हूं
हां, मैं चौकीदार हूं

कब तलक बचाओगे
कहो कहां छुपाओगे
पाप के ये पुलिंदे
कहां लेके जाओगे
मैं सख़्त पहरेदार हूं
हां, मैं चौकीदार हूं



* ये सिर्फ और सिर्फ एक रचना है। इसका किसी भी राजनीतिक पार्टी से कोई संबंध नहीं है। ये देश की जनता को समर्पित है और उन्हीं के लिए है क्यूंकि ये सच है कि अगर हर व्यक्ति देश की रखवाली अपने घर की तरह करे तो शायद सुधार की संभावना है।
🙏🙏🙏



                                                                                  -संदीप सिंह











                    
                    

Tuesday, April 9, 2019

                  

                        भोले - (भाग -३ )
                        ॐ नमः शिवाय

                  



है जटाधारी वो मेरा भोला 
है गंगधारी वो मेरा भोला
है चंद्रधारी वो मेरा भोला
है त्रिशूलधारी वो मेरा भोला
है डमरूवाला वो मेरा भोला
है त्रिनेत्रधारी वो मेरा भोला
है नंदीवाहक मेरा भोला 
सर्वदा सहायक मेरा भोला 
है ताण्डवकारी मेरा भोला 
है अर्धनारी वो मेरा भोला
है अविनाशी मेरा भोला 
है कैलाशी वो मेरा भोला 
योगी ध्यानी महाज्ञानी 
अंतर्यामी मेरा भोला 

                         ॐ नमः शिवाय         



                                             
अलख जगाऊँ मैं भसम रमाऊँ 
बजा के डमरू भोला गाऊँ 
डम डम डम डम नाद सुनाऊँ 
भूत प्रेत सब साथ नचाऊँ 
राख रगड़ मैं धुनी रमाऊँ 
माल खींच माहौल बनाऊँ 
मार के दम धुआँ उड़ाऊँ 
धुएँ से फिर मैं ॐ बनाऊँ 
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय 




ॐ बना के उसमें समाऊं
उसमें समा के ध्यान लगाऊं
ध्यान लगा के तुझे बुलाऊं
तुझे बुला के भोग चढ़ाऊं
भोग चढ़ा के डमरू बजाऊं
डमरू बजा के तुझे मनाऊं
तुझे मना के गाए जाऊं
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय



                          🙏संदीप  सिंह 🙏



Wednesday, March 20, 2019




                    भोले - (भाग -२)
                   ॐ नमः शिवाय 

                    



मस्त मगन मैं भोले में 
जैसे बैठा उड़न खटोले में 
माल रगड़ मैं खींचे जाऊँ 
डूबूँ धुएँ के गोले में 

इधर उधर मैं घूरे जाऊँ 
कुछ भी मुझको याद नहीं 
आदि भी भोला अंत भी भोला 
भोले के कुछ बाद नहीं 

भाँग धतूरा माल में भोला 
तांडव के हर ताल में भोला 
पैर पटक मैं नाचे जाऊँ 
मेरा तो हर हाल में भोला 

मारे जाऊँ मैं दम पे दम 
लेके नाम बबम बम बम 
दो ही चीज है भाती मुझको 
आँख लाल और हाथ चिलम 

लगे आज मैं स्वर्ग नाप लूँ 
काल की आँखों में भी झाँक लूँ 
तन मन भोला नाम रमा के 
मार पालथी मृत्यु ताक  लूँ 

मैं नहीं डरता काल वाल से 
मैं नहीं डरता किसी बवाल से 
न चिंता न भय है कोई 
छोड़ा है सब महाकाल पे 

                                          
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय 
                         

                                                    -संदीप सिंह

Tuesday, March 12, 2019





                मेरा  भोला - (भाग -१)
                ॐ नमः शिवाय

मेरे तन मन में है डोला मेरा शंकर बम बम भोला
मैं नाम उसी का रटा करूँ बस बम बम बम बम जपा करूँ


सिंहासन उसका सिंह की खाल 
माथ मुकुट गंगा का जाल 
डोल उठे ये धरा गगन सब 
जब तांडव में हो कदम ताल 

महादेव मेरा नीलकंठ है 
जल सा शीतल अग्नि प्रचंड है 
नाम में उसके हर-हर का डंका 
कामेश्वर है वो महा अखंड है 


रूद्र बने जब बड़ा भयंकर 
माने न फिर मेरा शंकर 
आँख तीसरी बस वो खोले 
तीनों लोक बना दे कंकर 

न लगता कोई तेरे सम्मुख 
क्रोध अग्नि जब तेरी भड़कती 
क़ाम क्रोध सब तेरे बस में 
तुझसे बड़ी न कोई शक्ति 

डम डम डमरू जब बाजे भूत प्रेत सब साथ में नाचे
 गूँजे नाद बबम बम  का तीनों लोक बजा दे डंका


क्या अमृत क्या विष का प्याला 
सब कुछ उसने पी डाला 
मस्तक शीतल चाँद सँवारे 
गले में शोभे विषधर माला 

हे महाविनाशक हे अनंतदृष्टि 
तू ही प्रथम फिर सारी सृष्टि 
भूत पिशाच दैत्य देव मानव
तेरे दरश से सबकी तृप्ति 

हे गिरिजापति गजेंद्र गंगाधराय 
लोकपाल ललाटाक्षा लोकांकराय 
हे अर्धनारीश्वर नीलकंठ कैलाशी 
सतीहृदय सतीपति गौरी शंकराय 
        ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय 


                                       - संदीप सिंह