नीम का पेड़
ऊंची डाली पे डाल के झूला जब मैं झूला करता
गिर जाओगे, लग जाएगी, कहता रहता नीम का पेड़
कड़ी धूप में सारे बच्चे, जब घर में सोते रहते थे
मैं मस्त छांव में खेला करता, तपता रहता नीम का पेड़
कभी तोड़ देता टहनियां, कभी खाल भी देता छील
कभी नहीं कुछ बोला वो, सहता रहता नीम का पेड़
गुस्से में जब मां मुझको, झाड़ू ले के दौड़ाती थी
मैं चक्कर काट के बचता था, हसता रहता नीम का पेड़
कभी स्कूल से घर आता तो मां होती थी खेतों में
टहनी पे चढ़ के सो जाता मैं, थपता रहता नीम का पेड़
गांव छोड़ने से पहले, पेड़ काटने की बात चली थी
मैं गुमसुम बैठा रहता, मुझको तकता नीम का पेड़
इतने बरस बीत गए, उमर बीत गई और बचपन भी
स्मृति से कभी जाता नहीं, दुलार दिखाता नीम का पेड़
- संदीप सिंह










