ऐ ज़िंदगी ,
ले ले तू कितने भी इम्तिहाँ
कर दे ख़िलाफ सारा जहाँ
मैं चलूँगा, चलता रहूँगा
पथ को मेरे तू कर दे विलय
या खड़े कर अनगिनत हिमालय
या खड़े कर अनगिनत हिमालय
मैं बढूँगा, बढ़ता रहूँगा
ग़र तेरी ख़्वाहिश है मुझे गिराने की
मेरी भी ज़िद है फिर मुस्कुराने की
मैं हसूँगा और हसता रहूँगा
तू बुझा दे रौशनी के सारे मशान
मिटा दे सूरज चाँद और आसमान
मैं जलूँगा, जलता रहूँगा
तुझे है चुनौती बार बार हर बार
रास्तों पे रख दे मुश्किलें हजार
मैं लड़ूँगा, लड़ता रहूँगा
ऐ ज़िंदगी ,
कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरी तूफान हवाओं में
ज़िक्र है जिनका रोज़ माँ की दुआओं में
मैंने कहा था और कहता रहूँगा
मैं चलूँगा, चलता रहूँगा
मैं जलूँगा, जलता रहूँगा
मैं हसूँगा और हसता रहूँगा
-संदीप सिंह
मैं चलूँगा, चलता रहूँगा
मैं जलूँगा, जलता रहूँगा
मैं हसूँगा और हसता रहूँगा
-संदीप सिंह

Bht achi h poem vry nyc ��
ReplyDeleteThank you😊🙏
Delete👌👌
ReplyDeletetoo good
ReplyDeleteThank you madam ji🙂
DeleteMza hi aa gya sir
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