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Tuesday, September 20, 2022

वो

 


वो लाज लपेटे लाल हुई

वो फिर से आज कमाल हुई

वो छत पे गीले बाल हुई

वो फिर से आज बवाल हुई....


वो पल्लू लपेटे कूल्हे पे

वो फिर से आज कमान हुई

वो सुर्ख गुलाबी होठ लिए

वो पनवारी का पान हुई....


वो केशों के मेघ लिए उमड़ी

वो फिर मयखाने की शाम हुई

वो नैन नशीले मतवाले से

वो फिर पैमाने का जाम हुई....

                        

              - संदीप सिंह

पापा

 


मेरे जीवन की नीव जिसने गढ़ी है

मेरी सांसों की धार जिससे बढ़ी है


जिसकी उंगली पकड़ के दौड़ा हूं मैं

जिसकी आंखों से दुनिया मैंने पढ़ी है


सर पे हाथ रख के विजय कर दिया

असंभव लड़ाई जिसके दम से लड़ी है


जिसने नीद ओ चैन लुटा दी मेरे लिए

मेरी खातिर ख़ुद की मुश्किलें गढ़ी हैं


मेरे सपने ज़िंदा रह सके इस ख्वाहिश में

जिसके ख्वाबों की हर दिन बलि चढ़ी है


ज़िन्दगी से जूझता रहा खामोशी समेटे

मुझे देख चेहरे की जिसकी हसी बढ़ी है


जिसे देख के लगता है सारी दुनिया मेरी है

जिसकी सूरत भगवान ने भगवान सी गढ़ी है

                                        - संदीप सिंह 

Saturday, September 17, 2022

मेरे साथ चलो कुछ दूर!

 

यूं हाथ छूटा सहसा तो न जाने क्या होगा

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


इस अंतहीन सफ़र में छांव भी नहीं दिखती

ऊपर से ये धूप बड़ी मगरुर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


सबसे सुना है पथ पथरीला रस्ता खाबड़

जहरीले सांपों से भरपूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


ऊपर से सब रंगे हुए है नेकी के रंगों से

अंतस में सारे ही हैं क्रूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


ये भी तय है सुमन खिलेगें पथ में बहारों का दस्तक होगा

पर तुम बिन कैसा नूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर


एक चले जाने को साहस हृदय नहीं करता

पर मैं नियति से मजबूर

मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर

                             - संदीप सिंह