वो लाज लपेटे लाल हुई
वो फिर से आज कमाल हुई
वो छत पे गीले बाल हुई
वो फिर से आज बवाल हुई....
वो पल्लू लपेटे कूल्हे पे
वो फिर से आज कमान हुई
वो सुर्ख गुलाबी होठ लिए
वो पनवारी का पान हुई....
वो केशों के मेघ लिए उमड़ी
वो फिर मयखाने की शाम हुई
वो नैन नशीले मतवाले से
वो फिर पैमाने का जाम हुई....
- संदीप सिंह