यूं हाथ छूटा सहसा तो न जाने क्या होगा
मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर
इस अंतहीन सफ़र में छांव भी नहीं दिखती
ऊपर से ये धूप बड़ी मगरुर
मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर
सबसे सुना है पथ पथरीला रस्ता खाबड़
जहरीले सांपों से भरपूर
मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर
ऊपर से सब रंगे हुए है नेकी के रंगों से
अंतस में सारे ही हैं क्रूर
मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर
ये भी तय है सुमन खिलेगें पथ में बहारों का दस्तक होगा
पर तुम बिन कैसा नूर
मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर
एक चले जाने को साहस हृदय नहीं करता
पर मैं नियति से मजबूर
मेरे यार, मेरे साथ चलो कुछ दूर
- संदीप सिंह
No comments:
Post a Comment