ठान ले ज़िद अब अड़ भी जा
आंख बंद कर ख्वाबों को समेट
चल भींच ले मुठ्ठी लड़ भी जा
उठ आंखों में अंगार भर
चल सीने में हुंकार भर
अपनी सांसों में फुंकार भर
आजा हाथों में औजार भर
अब आता है तूफां तो आने दे
आंधी को भी जी बहलाने दे
वो पौरुष ही क्या जो चलती सांसों में घुटने टेके
अब जाती है जान तो जाने दे
- संदीप सिंह