बंद सिग्नल से
सिग्नल खुलने के इंतज़ार में
किसी चौराहे पे था मैं खड़ा
टकटकी लगाए गिन रहा था
उन्न्यासी,अठहत्तर,सतहत्तर
तभी देखा फटे हुए कपड़ों में
बगल में था एक बच्चा खड़ा
आंखों में कीचड़
मुंह में लार बहाये
बदन पे पूरे
धूल का अंबार सजाये
मांस से पसलियां झांक रही थी
काले नाखून बाल खुजा रहे थे
मैं देख ही रहा था
कि बोल पड़ा
साहब पेन पांच का छोटा
दस का बड़ा
ले लो न साहब
मेरे मुंह से निकल गया- क्या करूंगा
बोला साहब लिख लोगे कुछ
ले लो न साहब
वो पेन बेच रहा था
लिखने की उम्र में
उसकी ये सज़ा थी
जाने किस जुर्म में
पता नहीं क्यूं
क्रंदन सा मच गया
अंदर सीने में
जैसे कुछ फस गया
और सिग्नल खुलने से पहले
मैंने दो पेन ले लिए
और उसी के दिए हुए पेन से
उसी के लिए ये अल्फ़ाज़ दे दिए
फिर याद आया कि उसने कहा था
कि साहब कुछ तो लिखोगे.........
-संदीप सिंह

Nice 👍
ReplyDeletedil ko chhu gai.....kya bat he sandeep ji
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