मैं तुमसे कहूं भी तो क्या, तुम समझोगी
आवारा है मनचला कहीं का
मैं कह भी दूं कि मधुबाला लगती हो,
मुस्कुराती हो जब, तुम समझोगी
बेशरम है बेहया कहीं का
मैं कह भी दूं कि थामे रक्खूंगा हाथ
बड़ी से बड़ी मुश्किलों में, तुम समझोगी
नौटंकी है बावला कहीं का
मैं तो कह दूं कि इश्क़ है तुमसे, जैसे
अदरक को चाय से, रास्ते को सफ़र से
मगर तुम समझोगी, कोई
मदमस्त, मस्तमौला, छैला कहीं का
- संदीप सिंह
No comments:
Post a Comment