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Tuesday, July 5, 2022

सुकून - तलाश

 

आंख मूद, सोच तू

क्या तेरी तलाश है

इधर उधर हैं झंझटें

सुकून तेरे पास है

तेरी जो निगाह है

व्यर्थ ही निराश है

उसको ढूंढ थक गया

जो तेरे ही पास है

तू थका है सोचता

आराम तो मिले कहीं

उतार दे थकान जो

वो शाम तो मिले कहीं


नाप के तू मंजिले

पार कर के साहिलें

जो तू लौटा ठौर पे 

खुद को देखा गौर से

बौखलाया तू बहुत 

क्या भला था छूट गया

सोच में था तू भला

क्या मुझे नहीं मिला

आसमां की चाह में

सुकून फेका गाह में 


रास्तों ने रख दिया

जब उसे झिझोड़कर

सुकून की तलाश में

उल्टे पांव दौड़ कर

छान मारी महफिलें

ढूढ़ डाले काफ़िले

तू समझ न पाया कि

ये कौन सा जुनून है 

जो भी चाहा पा लिया

न क्यूं मगर सुकून है 

            - संदीप सिंह 

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