चेतावनी
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर
वो पेड़ काटता न, उजाड़ता जंगल
प्रकृति से लड़ता, न दिखाता अपना बल
शौक पालता महलों के, न अट्टालियाँ बनाता
बिना रसायन के ही अपनी फसलें उगाता
न दे पाया सुकूँ मगर उसको मिट्टी का घर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
ये महज़ किसी विषाणु की नहीं इकाई है
स्थिति ये यूँ है कि तूने इंसानियत लुटाई है
मंदिर, मस्ज़िद, गिरज़ाघर में ऐसे पड़े हैं ताले
मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमां, कहाँ गए बोलने वाले
उसके संयम खोने से ही बरसा है कहर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर
सब जानते हैं निकलेगा इसका भी हल
फिर बनेंगी इमारतें और साफ होंगे जंगल
आज दुबके हैं घर में, कल छाती ठोकेंगे
अपने लालच को भला ये मनुज कैसे रोकेंगे
महा विनाश के चक्र का आएगा अंतिम प्रहर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
महामारी नहीं इसको, तुम चेतावनी समझो
प्राण बच जाए तो, किस्मत का धनी समझो
ईश्वर का इशारा है, खुद में बदलाव लाओ
प्रकृति से प्रेम करो, प्राणियों में समभाव लाओ
जो अब नहीं समझे तो प्रलय है मुकर्रर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
ये उसकी लालच, दुष्कर्मों का है असर
आज अपने ही मकाँ में कैदी है बशर
- संदीप सिंह
Bahoot khoob ...
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया 🙏
Deleteधन्यवाद 🙏
DeleteWaah
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