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Thursday, June 10, 2021

 मैं 

 
 
मैं पानी को शराब करता हूं
मैं लफ्ज़ों को किताब करता हूं
मैं खराब को अच्छा करता हूं, साहब
मैं अच्छे अच्छों को खराब करता हूं...

किसी चेहरे को आफ़ताब करता हूं
मैं तारीफें बेहिसाब करता हूं
मैं ख़्वाब को हकीकत कर देता हूं, साहब
मैं हकीकत को भी ख़्वाब करता हूं...

मैं घर की छत को आसमान करता हूं
उन दो कमरों को दो जहान करता हूं
मैं इंसान को खुदा कर देता हूं, साहब
मैं खुदा को इंसान करता हूं...

मैं दुश्मन को जनाब करता हूं
अंधेरे को भी आफताब करता हूं
मैं बेहिसाब को थोड़ा कर देता हूं, साहब
मैं थोड़े को बेहिसाब करता हूं...

मैं वक्त को गुलाम करता हूं
मैं सबको सलाम करता हूं
मैं कलाम को अटल कर देता हूं, साहब
मैं अटल को कलाम करता हूं...

मैं आंसुओं को मुस्कान करता हूं
मैं खामोशियों को तूफान करता हूं
मैं वीराने को घर कर देता हूं, साहब
मैं घर को वीरान करता हूं...
 
                                - संदीप सिंह

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